Sunday, February 6, 2011

हिन्दी के यात्रा-वृत्तान्त : प्रकृति और प्रदेय

    हिन्दी के परम्परागत अनुसंधान-विषयों जैसे- निबन्ध, उपन्यास, कहानी, नाटक, जीवनी आदि पर अब तक अनेकशः अनुसंधान हो चुके हैं और हो रहे हैं, किन्तु हिन्दी गद्य की अन्य विधाओं यथा सूचना प्रौद्योगिकी, यात्रा-वृत्त, रिपोर्ताज, आत्मकथा, डायरी लेखन आदि पर बहुत कम अनुसंधान-ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इन पर भी शोध की परम् आवश्यकता है।
    हिन्दी के यात्रा-वृत्त यद्यपि बहुतायत हैं किन्तु इस विधा पर हुए शोधों में यू० जी0 सी0 द्वारा अन्तर्जाल पर प्रकाशित सूची के अनुसार 1949 से 2004 तक मात्र एक शोध प्रबन्ध प्राप्त हो सका है तथा इस विधा पर उपलब्ध पुस्तकों की संख्या भी नगण्य ही है। उपलब्ध हो पा रही पुस्तकों में विश्वमोहन तिवारी की पुस्तक ‘हिन्दी का यात्रा साहित्य: एक विहंगम दृष्टि, रेखा परवीन उप्रेती की ‘हिन्दी का यात्रा साहित्य (1950-1990 तक), मुरारी लाल की ‘हिन्दी यात्रा साहित्य: स्वरूप और विकास, प्रतापपाल शर्मा की ‘हिन्दी का आधुनिक यात्रा साहित्य और डॉ0 अनिल कुमार का ‘स्वातन्त्र्योत्तर यात्रा साहित्य का विश्लेषणत्मक अध्ययन आदि ही हैं। इसी के मद्देनज़र प्रकृत् शोध-प्रस्तावना ‘हिन्दी के यात्रा-वृत्तान्त: प्रकृति और प्रदेय प्रस्तुत है।
    मनुष्य का चाहे बचपना हो अथवा युवावस्था उसकी प्रवृत्ति सदैव से ही घुमक्कड़ी रही है। वह अपने बाल्यकाल से लेकर प्रौढ़ावस्था तक कहीं न कहीं भ्रमण करने की चेष्टा किया करता है। इस भ्रमण में जो भी पात्र और विचार सम्पर्क में आते हैं वह उसके मानस-पटल पर अंकित हो जाते हैं। जब वह अपने मानस-पटल पर अंकित विचारों को लिपिबद्ध करता है तब वहीं से यात्रा-साहित्य का जन्म होता है। लेखक जब यात्रा साहित्य का सृजन करता है तब उसके मूल में उसका प्रकृति के प्रति प्रेम और उसके दार्शनिक विचार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    यात्रा शब्द की व्युत्पत्ति ‘या’ में ष्टुन धातु एवं प्रत्यय के जोड़ने से हुई है। यात्रा का अर्थ होता है एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। किसी यात्रा का जीवन्त विवरण और लेखक की उससे जुड़ी संवेदनायें मिलकर यात्रा साहित्य का निर्माण करती हैं। लेखक को यात्रा-वृत्त का वर्णन इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि उसका चित्र पाठक के समक्ष पूर्णरूपेण उभर जाये। यही कारण है कि यात्रा-वृत्त लिखने वाला, इतिहासकार से अधिक चित्रकार होता है। डॉ0 रामचन्द्र तिवारी के शब्दों में- ‘‘यात्रा-वृत्तान्तों में देश-विदेश के प्राकृतिक दृश्यों की रमणीयता, नर-नारियों के विविध जीवन सन्दर्भ, प्राचीन एवं नवीन सौन्दर्य चेतना की प्रतीक कलावृत्तियों की भव्यता तथा मानवीय सभ्यता के विकास के द्योतक अनेक वस्तु, चित्र, यायावर लेखक-मानस में रूपायित होकर वैयक्तिक रागात्मक ऊष्मा से दीप्त हो जाते हैं। लेखक अपनी बिम्बविधायिनी कल्पना शक्ति से उन्हें पुनः मूर्त करके पाठकों की जिज्ञासा-वृत्ति को तुष्ट कर देता है।’’1
    यात्रा साहित्य का प्रथम ग्रन्थ सन् 1883 ई0 में श्रीमती हरदेवी द्वारा लिखित ‘लन्दन यात्रा’ माना जाता है। डॉ0 रामचन्द्र तिवारी ने यात्रा साहित्य का प्रारम्भ भारतेन्दु से माना है। तिवारी जी के शब्दों में ‘‘हिन्दी साहित्य में यात्रा-वृत्तान्त लिखने की परम्परा का सूत्रपात भारतेन्दु से माना जा सकता है। भारतेन्दु ने ‘सरयू पार की यात्रा’, ‘मेंहदावल की यात्रा’ और ‘लखनऊ की यात्रा’ आदि शीर्षकों से इन वृत्तान्तों का बड़ा रोचक और सजीव वर्णन प्रस्तुत किया है।’’2 भारतेन्दु के बाद यात्रा साहित्य की एक अखण्ड परम्परा देखने को मिलती है। इन यात्रा-वृत्तों में हिन्दी प्रदेश में निवास करने वाले विशाल मानव-समुदाय के मानसिक क्षितिज की सूचना मिलती है। इन रचनाओं में पं0 दामोदर कृत ‘मेरी पूर्व दिग्यात्रा’, देवी प्रसाद खत्री कृत ‘रामेश्वर यात्रा’ और ‘बदरिकाश्रम यात्रा’, शिव प्रसाद गुप्त कृत ‘पृथ्वी प्रदक्षिणा’ और पं0 राम नारायण मिश्र कृत ‘यूरोप यात्रा में छः मास’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
    महापण्डित राहुल सांकृत्यायन, रामबृक्ष बेनीपुरी, यशपाल, अज्ञेय, डॉ0 भगवतशरण उपाध्याय, रामधारी सिंह  ‘दिनकर’, नागार्जुन, प्रभाकर माचवे, राजा बल्लभ ओझा आदि अनेक यात्रा प्रेमी तथा जन्मजात शैलानी प्रवृति के यायावर सामने आए। इन्हीं के द्वारा हिन्दी के यात्रा-साहित्य की श्री वृद्धि हुई। महत्त्व के यात्रा-वृत्तों में राहुल सांकृत्यायन कृत ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘किन्नर देश में’ और ‘रूस में पच्चीस मास’; रामबृक्ष बेनीपुरी कृत ‘पैरों में पंख बांधकर’ और ‘उड़ते चलो-उड़ते चलो’; यशपाल कृत ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’; अज्ञेय कृत ‘अरे यायावर रहेगा याद’ और ‘एक बूँद सहसा उछली’; डॉ0 भगवतशरण उपाध्याय कृत ‘कलकत्ता से पोलिंग’ और ‘सागर की लहरों पर’; रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कृत ‘देश-विदेश’; प्रभाकर माचवे कृत ‘गोरी नज़रों में हम’ प्रमुख हैं। परवर्ती लेखकों में मोहन राकेश कृत ‘आखिरी चट्टान तक’; प्रभाकर द्विवेदी कृत ‘पार उतरि कहँ जइहौ; डॉ0 रघुवंश कृत ‘हरी घाटी’ तथा धर्मवीर भारती कृत ‘यादें यूरोप की’ आदि रचनाओं की अधिक चर्चा हुई।
    यदि देखा जाय तो पिछले बीस-बाईस वर्षों से हिन्दी का यात्रा-साहित्य अधिक विकसित हुआ। सांस्कृतिक यात्रा-वृत्त भी अब अधिक लिखे जाने लगे हैं। हमारे साहित्यकारों को विदेशी भ्रमण की सुविधाएं भी अधिक मिलने लगी हैं फलतः यात्रा-वृत्तान्तों की गिनती में भी इज़ाफा होने लगा है। अमृता प्रीतम कृत ‘इक्कीस पत्तियों का गुलाब’; दिनकर कृत ‘मेरी यात्राएं’; डॉ0 नगेन्द्र कृत ‘अप्रवासी की यात्राएं’; श्रीकान्त शर्मा कृत ‘अपोलो का रथ’; गोविन्द मिश्र कृत ‘धुन्ध भरी सुर्खी’; कमलेश्वर कृत ‘खण्डित यात्राएं’; विष्णु प्रभाकर कृत ‘ज्योति पुंज हिमालय’; रामदरश मिश्र कृत ‘तना हुआ इन्द्र धनुष’ आदि कृतियां इस विधा की उपलब्धि मानी जाती हैं। यात्रा-वृत्तों में हम दृश्यों, स्थितियों और उनके अनुकूल-प्रतिकूल लेखक की मानसिक प्रतिक्रियाओं से भी परिचित होते हैं। यही कारण है कि यात्रा-वृत्तों का स्वरूप भी लेखक की रुचि, संस्कार, संवेदनशीलता और मानसिकता के अनुसार पृथक्-पृथक् ढल जाता है।
    निष्कर्षतः रामचन्द्र तिवारी के शब्दों में ‘‘यात्रा-वृत्तान्त सामान्य वर्णनात्मक शैली के अतिरिक्त डायरी, पत्र और रिपोतार्ज शैली में भी लिखे जाते हैं। इसलिए इनमें निबन्ध, कथा, संस्मरण आदि कई ग्रन्थ रूपों का आनन्द एक साथ मिलता है। हिन्दी में यात्रा-साहित्य का भविष्य उज्जवल है।’’3
    वास्तव में इस विधा का अध्ययन तथा विश्लेषण, इसको और परिमार्जित करके समृद्ध होने का सुअवसर प्रदान करेगा। यही इस लेख का मूल उत्स और अभीष्ट है।

सन्दर्भः-
  1. डॉ0 तिवारी, रामचन्द्र, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी, 1992 ई0, पृ0-296. 
  2. डॉ0 तिवारी, रामचन्द्र, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी, 1992 ई0, पृ0-295.
  3. डॉ0 तिवारी, रामचन्द्र, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी, 1992 ई0, पृ0-297.
                             - शालिनी पाण्डेय
                                    प्रवक्ता, हिन्दी विभाग
                        श्रीमती जे0 देवी महिला पी0 जी0 कॉलेज
                                   बभनान, गोण्डा (उ0 प्र0)

5 comments:

  1. उत्तम प्रयास। बधाई।

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  2. यात्रा-वृत्तान्त विधा के मूल को दर्शाता बहुत अच्छा लेख। बधाई ।

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  3. bhut hi acha pryas h .vese bhi yatra sahitya par kam hi pustke uplabd h ...........

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